Siriya
सीरियाई अरब फ़ौज, बल्कि कोई भी मुस्लिम फ़ौज को अमेरिका के सामने अपनी क़ुव्वत साबित करने की कोई ज़रूरत हीं नहीं हैं।
इसके बावजूद कुछ लोग शाहीनों की कार्रवाई को लेकर फेसबुक पर हलब के शेख़ मक़सूद और अशरफ़िया के हवाले से यह राग अलाप रहे हैं कि अमेरिका “जाँच” कर रहा है कि सीरियाई अरब फ़ौज मिलिशियाओं को कुचल सकती है या नहीं।
जबकि हक़ीक़त इससे बिल्कुल मुख़्तलिफ़ है, अमेरिका यह बात पहले से जानता है कि अगर मौजूदा सीरियाई फ़ौज को पूरी आज़ादी मिल जाए, तो वह महज़ 48 घंटों में पूरे सीरिया को फिर से एक कर सकती है।
इसकी ज़िंदा मिसाल उस वक़्त सामने आई, जब बाहरी दख़ल हटा और शामी सदर अहमद अल-शर्राअ की फ़ौज बश्शार अल-मलऊन के भगोड़े सैनिकों के दरमियान की रुकावट ख़त्म हो गई, नतीजा यह निकला कि सिर्फ़ 11 दिनों में तमाम इलाक़े आज़ाद हो गए।
बश्शार अल-मलऊन के सैनिकों ने कोई संजीदा मुक़ाबला किया ही नहीं, वे गोली चले बग़ैर ही दहशत के आलम में टूटकर बिखर गए।
सुवैदा की मिसाल भी सबके सामने है, उस पर दो बार क़ब्ज़ा हुआ।
एक मर्तबा सीरियाई फ़ौज ने कुछ ही घंटों में इलाक़ा अपने क़ब्ज़े में ले लिया, और दूसरी बार शामी क़बायली ताक़तों ने, मगर अमेरिकी सफ़ीर के दबाव और इज़राइली दज्ज़ाली शैतानों की हवाई बमबारी के चलते उन्हें पीछे हटना पड़ा।
अगर और मिसालें चाहिएँ तो सऊदी अरब को देखिए, जब उसे यमन में खुलकर कार्रवाई करने का मौक़ा मिला, तो उसने यमन में मिनी अमीराती दज्ज़ाल बिन ज़ायेद की मिलिशियाई ताक़तों को किस तरह रौंद डाला।
आज सूडान को देखिए, जहाँ मिनी अमीराती दज्ज़ाल बिन ज़ायेद के दहशतगर्द मिलिशिया RSF के ख़िलाफ़ बड़ा सैन्य अभियान शुरू हो चुका है, अगर बाहरी रुकावट न डाली जाए, तो चंद दिनों में पूरा सूडान आज़ाद हो सकता है।
जब मुसलमान हक़ के लिए मैदान में उतरता है, तो दुनिया की कोई ताक़त उसे रोक नहीं सकती, मसला मैदान का नहीं, मैदान हमारा है, हम उसे जानते हैं और वह हमें जानता है।
असली मसला है बाहरी दबाव, अमेरिकी सियासी चालें, और वह अंतरराष्ट्रीय तवाज़ुन जो हवाई व तकनीकी बढ़त, आर्थिक पाबंदियों और आख़िरकार परमाणु दबाव के ज़रिये मुसल्लत किया जाता है।
ये सारे हथियार न आज सीरिया के पास हैं और न ही किसी और मुस्लिम मुल्क के पास हैं।
इसी वजह से तुर्की पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है, और आने वाले एक-दो साल में वह इस मक़सद के क़रीब पहुँच सकता है।
इसी तरह तुर्की और सऊदी अरब, पाकिस्तान की परमाणु प्रतिरोध क्षमता के दायरे के क़रीब जाने की जद्दोजहद में हैं।
मगर फ़िलहाल तकनीकी और आर्थिक फ़ासला इतना वसीअ है कि अमेरिका की सैन्य और ख़ास तौर पर आर्थिक बादशाहत अब भी क़ायम है।
Tosif Sherani ✍️
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