Pentr

 बहुत साल पहले मेरे यहां एक पेंटर काम करता था  ।

आमतौर पर उनकी दिहाड़ी सुबह 9:00 से शाम 5:00 बजे तक होती है जिसमें दोपहर एक से दो बजे तक इनका लंच होता है ।

तो यह पेंटर भाई 10:00 बजे काम पर आया करता था , उसके बाद जाकर सामान चेक करता था फिर मेरे पास आकर बोलता भैया पुट्टी नहीं है , कभी प्राइमर नहीं है , कभी पेंट नहीं है ,  कभी ब्रश नहीं है ,  अर्थात रोज किसी न किसी सामान की कमी निकाल देता था ।

फिर मैं गुस्सा करता हूं की शाम को क्यों नहीं चेक करता है तो हंसने लग जाता ।

 फिर मैं कहता कि चल मंगवा लेता हूं तो कहता कि भैया मैं ही ले आऊंगा अपने हिसाब से ।

मुझे पता है कि यह लोग खुद इसलिए खरीदने जाते हैं क्योंकि इनका कुछ कमीशन बन जाता है फिर भी मैं इन्हें खरीदने देता था वरना यह लोग सामान में कमी निकालते हैं कि आप डुप्लीकेट माल ले कर आ गए, इसकी पकड़ अच्छी नहीं है,  इसकी कवरेज अच्छी नहीं है आदि आदि ।

इस प्रकार लगभग 11 बजे बजे मेरा काम शुरू होता था।  

 2 घंटे बाद 1 से 2 के बीच लंच टाइम शुरू हो जाता था 

 वो भाई खाना तो 15 मिनट में खा लेता था लेकिन 45 मिनट तक लेट कर गाने सुनता था ।

मैं उससे बोलता कि भाई तूने काम इतनी देर से शुरू किया है तो लंच टाइम कम कर ले पर वह साफ मना कर देता की भैया 1 घंटे का रेस्ट तो चाहिए ही ।

फिर 4:30 बजे से ही वो काम समेटना शुरू कर देता था , कपड़े बदलकर हाथ मुंह धो कर 5:00 बजे प्रॉपर्टी से बाहर।

 गुस्सा तो मुझे बहुत आता था लेकिन उस समय कोई विकल्प नहीं था तो झेलना पड़ रहा था , लेकिन एक दिन मुझे बहुत अच्छा मुस्लिम पेंटर मिल गया ।

और वह मेरे यहां ऐसा जमा कि अगले 10 साल तक मेरे सारे काम उसी ने किया ।

उसकी टीम इतनी एफिशिएंट थी और काम के प्रति इतनी डेडीकेटेड थी कि कई बार ऐसे मौके आए कि रिजॉर्ट की ओपनिंग है , ब्लिस की ओपनिंग है , नए योगा हॉल की ओपनिंग है , नए रेस्टोरेंट की ओपनिंग है , अगले दिन गेस्ट आने हैं और पूरी पूरी रात काम हो रहा है , और पेंटर्स के चेहरे पर शिकन तक नहीं है ।

मुझे वैसे भी डेढ़ दिहाड़ी , दो दिहाड़ी वाला सिस्टम ज्यादा समझ में आता है कि तुम्हे ज्यादा पैसा मिलेगा और मुझे समय पर काम मिलेगा ।

एक दिन पुराना पेंटर मेरे पास आया और  बोला कि भैया आपने अपने आदमी को छोड़ कर  गैर आदमी को रख लिया ।

मैं उसका मतलब समझ गया ।

मैने उसे कहा कि भाई मैने तुझे अपना समझ कर ही काम दिया था पर अफसोस कि तूने उस अपनेपन का मान नहीं रखा ।

कोई भी रिश्ता दोनों तरफ से चलता है ।

और कारीगर हिंदू हो या मुस्लिम , उसकी पूजा , उसकी इबादत उसका काम  है ।

यदि आप अपने काम के प्रति ईमानदार नहीं हो तो आप कभी मार्केट में टिक नहीं पाओगे , जैसे ही सामने वाले को आपसे अच्छा विकल्प मिलेगा आप रिप्लेस हो जाओगे ।

अगली पोस्ट में मैं अपने अनुभव के आधार पर  हिंदू और मुस्लिम लेबर के माइंडसेट की तुलना करूंगा और दोनों में अंतर बताऊंगा ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Links hindi

Aamanu

Victorya